और मैं भी परोक्ष रूप से शायद...(Poetry)

नहीं कहूंगा मैं कभी कि तुम भी कभी प्रेम में थी मुझसे...
और मैं भी परोक्ष रूप से शायद...
 भुला दूंगा कि मिले थे हम कभी ज्योग्राफी डिपार्टमेंट में...
 कि भुला गए वो दिन,जो पहली मुलाकात के थे और शायद आखिरी भी....
अब नहीं मिलेंगे कभी उस इंतजार से, जो हुआ करता था कभी तुमसे मिलने को...
बस मिलेंगे अब एक दूसरे की कहानियां सुनने को,ना कि कहानियां बनने को,
जो गुनगुना रही होंगी किसी बेसुरी आवाज में भविष्य की फलीभूत करती हुई....
  कह दूंगा कि मैं खुद से ही वो झूठ...
 कि नहीं था कभी तुमसे प्रेम,अति प्रेम...
कायाकल्प मनोरम भाव सांद्रता से ओतप्रोत मौसम छाव भी शायद....

~उदय 

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