आज हमने सबसे बात की थी...

आज हमने सबसे बात की थी...
जिनको नजरंदाज कर दिया करते थे अक्सर ही...
उनसे खासकर....
आज उन सबसे मिले थे....
जिनसे मिलना मिलना ही रह जाता था ...
 हूं हूं कर रहा था हमेशा की तरह...
पर सुन रहा था...
इस बार....
एक एक बात...

गहराई से....
बात की तह में कभी कुछ मिलता था तो कभी कुछ...
पर खत्म नहीं हो रहा था...
शायद खत्म करना भी नहीं चाह रहे थे...

हमने फोन भी पहले नहीं काटा...
उतना सुना,जितना सुना जा सकता था...
पर बोलना,जैसे बोलने को कुछ बचा ही ना हो...
बात करते हुए कविताएं लिख रहे थे...
लिखे जा रहे थे,लिखे जा रहे थे...
लिखते लिखते रूक भी जा रहे थे...
शायद इसलिए कि काफी दिन बाद लिख रहे थे,फिर से एक कविता...शायद महीनों बाद....
या शायद इसलिए कि चले जा रहे थे कविताओं की तह तक खुद ही....
जिसमें से निकलना मानो पुनर्नवा की भांति लग रहा था...
जिसके सौंदर्य में खोना पुलकित पुलकित कर दे रहा था...
वो वादे, पाकीज़ इरादे,जो अभी ताजे ही थे....
पर वो सब भी इसी कविता की भांति अधूरा लग रहा था...
ठीक इस कविता की तरह...जैसे ये भी अधूरी छोट गई...
        ~अपराजित♥️

Comments